BhaktiVed
ॐ

Ghunghat Ke Pat Khol Re

BhajanAuthor: कबीर (Kabir)

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घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

घट घट में वही साँईं रमता, कटुक वचन मत बोल रे।

घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे।

घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

सुन्न महल में दियना बारि ले, आसन से मत डोल रे।

घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

जोग जुगत से रंग महल में, पिय पायो अनमोल रे।

घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

कहै कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढोल रे।

घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

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Source: Kabir pad; text as commonly sung

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